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dna analysis coronavirus vaccine fake news cowin app fraud | असली Corona Vaccine पर फर्जी CoWIN App की साजिश, जान लीजिए ये जरूरी बातें

नई दिल्‍ली: कोरोना की वैक्‍सीन कब पहुंचेगी, इसकी तारीख सोमवार को सामने आ सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वैक्‍सीन को लेकर एक बैठक करने वाले हैं.  लोगों के मन में इस वक्त वैक्‍सीन को लेकर कई सवाल हैं.  सभी लोग सोच रहे हैं कि उन्हें कब वैक्सीन दी जाएगी और वैक्सीन के लिए क्या करना होगा. इन सब सवालों के जवाब आज स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दिए हैं. 

पूरे देश में कल 8 जनवरी कोरोना वैक्‍सीनेशन का दूसरा ड्राई रन  हुआ.  उत्तर प्रदेश, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के 736  जिलों में वैक्‍सीन  पर ड्राई रन किया गया. वैक्‍सीन सबसे पहले हेल्‍थ वर्कर्स  को लगाई जाएगी और इसके बाद फ्रंटलाइन वर्कर्स का नंबर आएगा लेकिन आप थोड़ा सावधान रहें क्योंकि, वैक्‍सीन के नाम पर आपके साथ फ्रॉड भी हो सकता है. संभव है पिछले कुछ दिनों में आपको भी किसी ऐसे Mobile App का लिंक मिला हो जिसका नाम CoWIN या फिर इससे मिलता-जुलता हो.  अगर ऐसा है तो आप भूलकर भी ऐसे App को अपने मोबाइल फोन में डाउनलोड न करें. 

भारत में आम जनता को वैक्‍सीन लगवाने के लिए CoWIN App डाउनलोड  करना होगा. हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस ऐप को अब तक लॉन्च नहीं किया है. यानी अगर आपके मोबाइल फोन में इस नाम से कोई ऐप है, तो वो फर्जी है.  इस ऐप का मकसद सिर्फ आपका डेटा यानी जानकारी चुराना है.  इसलिए आप सावधान हो जाइए..

देश में 96 प्रतिशत से ज्‍यादा  कोरोना के मरीज स्वस्थ हो चुके है.  लेकिन अफवाहों की वैक्सीन ने कई लोगों को परेशान कर रखा है. जिस पर आपको सावधान करने के लिए हमने एक रिपोर्ट तैयार की है. 

भारत में कोरोना महामारी से बचने के लिए टीकाकरण अभियान शुरू नहीं हुआ है. लेकिन इससे पहले वैक्‍सीन के नाम पर ठगी शुरू हो गई है. वैक्सीन लगवाने के उत्साह में कुछ लोग फेक न्‍यूज़ के जाल में फंस गए हैं. देश में CoWIN ऐप के जरिए टीकाकरण अभियान चलाया जाएगा. इस ऐप की लॉन्चिंग नहीं हुई है, लेकिन गूगल प्ले स्टोर पर CoWIN से मिलते जुलते नाम वाले आधा दर्जन ऐप पहले से बन गए हैं.

प्‍लेस्‍टोर  पर 3 Apps ऐसे हैं जिनके नाम CoWIN जैसे हैं.  इन एप्‍स को अब तक 10 हजार से अधिक लोग डाउनलोड कर चुके हैं. ये ऐप डाउनलोड  होने के बाद आपके मोबाइल फोन के कॉन्टैक्ट, फोटो आदि हासिल करने की जानकारी भी मांगता है और संभव है, अब तक कई लोग इन एप्‍स को अपनी पर्सनल जानकारी दे चुके होंगे.  हालांकि कई लोगों ने रिव्‍यू में लिखा है और ऐप को फर्जी बताया है. वैक्सीन के नाम पर नकली एप्‍स ने महामारी में लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी है. 

जिस ऐप से भारत में कोरोना की वैक्‍सीनेशन प्रक्रिया शुरू होगी, उस ऐप का नाम CoWIN है.  हम आपको फिर से बताना चाहते हैं कि ये ऐप  अभी लॉन्च नहीं हुआ है.  केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया है कि वैक्सीनेशन अभियान शुरू होने से पहले CoWIN ऐप को लॉन्च किया जाएगा. जिसके बाद लोग इसे डाउनलोड  कर सकेंगे. 

आपको वैक्सीन लगवाने के लिए ऐप में खुद को रजिस्‍टर  करना होगा. आप आधार नंबर से भी अपना रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं.  CoWIN App 12 भाषाओं में काम करेगा. वैक्सीन की 2 डोज लेने के बाद इस ऐप  से आपको सर्टिफिकेट भी मिलेगा.  वैक्सीन लगवाने के बाद अगर किसी को कुछ परेशानी होती है तो साइड इफेक्ट मॉनिटरिंग की व्यवस्था भी इस ऐप में ही है.  CoWIN App डिजीलॉकर से भी जोड़ा जाएगा.  ताकि वैक्सीन लगने का सर्टिफिकेट इसी ऐप में सुरक्षित रख सकें.  24 घंटे की हेल्पलाइन और Chatbot भी ऐप में उपलब्ध होगा. 

CoWIN App में 5 मॉड्यूल  होंगे. पहला मॉड्यूल एडमिनिस्ट्रेशन है, ये मॉड्यूल उन लोगों के लिए है जो टीकाकरण कार्यक्रम का संचालन करेंगे. दूसरा मॉड्यूल है रजिस्ट्रेशन,  इस मॉड्यूल के जरिए लोग टीका लगवाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाएंगे. तीसरा मॉड्यूल वैक्सीनेशन है,  जिसके जरिए रजिस्ट्रेशन करवाने वाले लोगों की जानकारी वेरिफाई होगी. चौथा मॉड्यूल beneficiary acknowledgement module है. जिसके द्वारा टीका लगवाने वाले लोगों को मैसेज भेजे जाएंगे,  इससे QR कोड भी जेनरेट होगा और लोगों को वैक्सीन लगवाने का E-Certificate भी मिलेगा. 

आखिरी मॉड्यूल का नाम रिपोर्ट है. रिपोर्ट मॉड्यूल से टीकाकरण कार्यक्रम की रिपोर्ट तैयार होगी, इसमें टीकाकरण के सेशन, टीका लगवा चुके लोगों की संख्या की जानकारी होगी. ये संभव है कि आपको मोबाइल फोन या ई-मेल पर फर्जी मैसेज या लिंक पहुंच गया हो. जिसमें ये दावा किया गया हो कि वो आपको मुफ्त में वैक्सीन दिलवा सकता है. लेकिन ये सब फर्जी है.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लोगों को वैक्सीन पर अफवाह से बचने की सलाह दे चुके हैं. 

कोरोना की वैक्‍सीन को आप तक पहुंचाने के लिए पुणे को वैक्‍सीन का वितरण का केंद्र बनाया गया है.  यहां से हवाई जहाज की मदद से देश के 4 प्राइमरी वैक्सीन स्टोर तक वैक्‍सीन  पहुचाई जाएगी. ये केंद्र करनाल, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में बनाए गए हैं. इसके बाद यहां से वैक्‍सीन को राज्यों के वैक्‍सीन स्‍टोर तक पहुंचाया जाएगा.  देश में 37 वैक्सीन स्टोर बनाए गए हैं और इसके बाद की जिम्मेदारी राज्य सरकार और जिला प्रशासन की होगी. 

आनेवाले कुछ दिनों में वैक्सीनेशन से जुड़ी कई और फेक न्‍यूज़ और Fake Apps सामने आ सकते हैं. लेकिन जब तक सरकार की तरफ से कोरोना टीकाकरण अभियान पर आधिकारिक जानकारी नहीं दी जाती. तब तक आप किसी भी तरह की फर्जी जानकारी से बचें.

कोरोना वायरस की वैक्सीन पर आपको सिर्फ फ्रॉड से ही नहीं बचना है, आपको खुद को Fake News से भी बचाना है.  इसलिए अब हम आपके साथ इस बीमारी पर चर्चा करना चाहते हैं, जो कोरोना वायरस से भी ज़्यादा संक्रामक है और इस बीमारी का नाम है Fake News. चार जनवरी को हमने आपको ये जानकारी दी थी कि Zee News की रिपोर्टर पूजा मक्कड़ ने भारत की अपनी Made in India Covaxin लगवाई है और जैसा कि हमने आपसे वादा किया था कि इस खबर पर जो भी अपडेट होगा, उसे हम ईमानदारी से आप तक पहुंचाएंगे,  हमें गर्व है कि हमने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया.  लेकिन कुछ लोग हैं, जिन्हें Zee News की सच्ची पत्रकारिता पसंद नहीं आई और उन्होंने इस खबर पर भी Fake News की सुंदर सी इमारत खड़ी कर ली और जब कोई इमारत सुंदर  दिखती है,  तो आते-जाते लोग उसे रुककर देखते हैं.  हमारी खबर पर जो Fake News फैलाई गई, उस पर भी ऐसा ही हुआ है. 

Facebook, Twitter और Instagram जैसे कई सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म्‍स पर एक फेक न्‍यूज़ तेजी से फैली कि Zee News की रिपोर्टर पूजा मक्कड़ बीमार हो गई हैं और उन पर वैक्सीन के साइड इफेक्‍ट्स हुए हैं.  कई वेबसाइट्स पर भ्रामक और गलत जानकारियों के साथ ये दावा किया गया कि पूजा मक्कड़ को तेज बुखार है.  इनमें से एक वेबसाइट का नाम है, द शूद्र,  जिसके ट्विटर अकाउंट  से ये फेक न्‍यूज़  फैलाई गई कि पूजा मक्कड़ पर वैक्सीन के साइड इफेक्‍ट्स  हुए हैं और आपको जानकर हैरानी होगी कि ये एक वेरिफाइड ट्विटर अकाउंट  है. इसी तरह खुद को कांग्रेस का प्रवक्ता बताने वाले सुरेंद्र राजपूत नाम के व्यक्ति ने भी इस फेक न्‍यूज़  को अपने ट्विटर अकाउंट पर जगह दी है और ये अकाउंट भी वेरिफाइड है.  अब आप सोचिए कि ऐसे लोग फेक न्‍यूज़  फैला रहे हैं. 

यानी जिस चीज़ का हमें सबसे ज़्यादा डर था, वही हुआ. फेक न्‍यूज़  ने बुलेट ट्रेन की रफ्तार से पूरे भारत का चक्कर लगाया और बहुत से लोग इस ट्रेन में सवार भी हो गए.  

लोगों के डर को दूर करने के लिए हमारी सहयोगी पूजा मक्कड़ ने 4 जनवरी को दोपहर दो बजे ये वैक्सीन लगवाई थी और तब हमने खुद आपको इसकी जानकारी दी थी.  हम चाहते थे कि भारत में बनी वैक्सीन पर हो रहा दुष्प्रचार लोगों में अविश्वास को पैदा ना कर पाए.  इसलिए हम इस खबर के साथ आप तक पहुंचे.  वादे के मुताबिक, हमने 5 जनवरी को पूजा मक्कड़ के स्वास्थ्य पर आपको जरूरी अपडेट दिया.  तब हमने कहा था कि पूजा मक्कड़ को बुखार हुआ है और इसका मतलब ये है कि वैक्सीन अपनी काम कर रही है. इसके बाद हमने आपको ये भी बताया कि अब बुखार उतर चुका है और पूजा मक्कड़ पूरी तरह स्वस्थ हैं. लेकिन Fake News फैलाने वालों ने आपको ये नहीं बताया.  इसलिए आज हम इन लोगों को एक शुभ समाचार देना चाहते हैं कि वैक्सीन लगवाने के 103 घंटे बाद भी पूजा मक्कड़ पूरी तरह स्वस्थ हैं. 

एक रिसर्च के मुताबिक ट्विटर पर फेक न्‍यूज़ की रफ्तार सच्ची खबरों से 6 गुना ज्यादा तेज होती है और Zee News ने वैक्सीन पर जो आपको खबर दिखाई थी, उस पर भी ऐसा ही हुआ. 

एक Fake News क्या कर सकती है, इसे आप इस उदाहरण से समझिए. 

वर्ष 1979 में लोकमान्य जयप्रकाश नारायण की तबीयत काफी खराब थी और तब ये अफवाह तेजी  से फैली कि उनका निधन हो गया है.  इस अफवाह ने भारतीय संसद को भी उलझन में डाल दिया और आलम ये था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने संसद को ये Fake News देकर उन्हें श्रद्धांजलि भी अर्पित कर दी थी.  लेकिन बाद में जब इस अफवाह की पोल खोली तो देशभर में इस पर काफी चर्चा हुई. 

दुनिया में फेक न्‍यूज़  का चलन किस हद तक बढ़ गया है.  इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि फेक न्‍यूज़ शब्द को पिछले वर्ष Oxford Dictionary में औपचारिक तौर पर शामिल कर लिया गया है.  ऑक्‍सफोर्ड ने फेक न्‍यूज़  को परिभाषित करते हुए कहा है कि ये वो न्‍यूज़ होती है जिसमें गलत, झूठी और भ्रामक जानकारियां शामिल होती हैं.  Oxford Dictionary के मुताबिक, इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार वर्ष 1890 में किया गया था. 

माना जाता है कि आधुनिक काल में फेक न्‍यूज़ का पहला मामला वर्ष 1835 में सामने आया था. तब अमेरिका के एक अखबार The Sun ने चंद्रमा पर जीवन मिलने का दावा किया था.  अखबार ने कुछ तस्वीरें भी प्रकाशित की थीं और उन तस्वीरों में मौजूद इंसानों के शरीर पर चमगादड़ की तरह पंख लगे हुए थे. कई हफ्तों तक इस अखबार को पढ़ने वाले लोग इन तस्वीरों को सच मानते रहे और ये घटना The Great Moon Hoax के नाम से प्रसिद्ध है.  हालांकि इस फेक न्‍यूज़ की वजह से तब The Sun अखबार का सर्कुलेशन  बहुत बढ़ गया था और आज फेक न्‍यूज़  एक बड़ा कारोबार बन चुका है, जिसमें लोगों तक गलत और भ्रामक जानकारियां पहुंचाई जाती हैं. 



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