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DNA ANALYSIS JNUSU calls for protests on unveiling of Swami Vivekanandas statue by PM Modi | DNA ANALYSIS: JNU में विवेकानंद की मूर्ति के अनावरण पर विरोध क्यों?

नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में भारत तेरे टुकड़े टुकड़े होगे के नारे लगते हैं, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगते हैं और खुलेआम आतंकवादी अफज़ल गुरु का समर्थन किया जाता है. लेकिन JNU के छात्रों को अपने कैंपस में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति लगाए जाने से परेशानी है. कल 12 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए JNU कैंपस में स्वामी विवेकानंद की एक प्रतिमा का अनावरण किया और इस मौके पर भी JNU के छात्र विरोध प्रदर्शन करने लगे. विरोध यहां तक पहुंच गया कि छात्र नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद के नारे भी लगाने लगे. इन छात्रों के हाथ में Modi Go Back के पोस्टर्स भी थे.

स्वामी विवेकानंद की मूर्ति लगाई जाती है तो इसका विरोध शुरू हो जाता है
ये कितने दुख की बात है कि इस यूनिवर्सिटी में आतंकवादी अफ़ज़ल गुरु के समर्थन में नारे तो लगाए जा सकते हैं, कहा जाता है कि अफजल हम शर्मिदा है,..तेरे कातिल जिंदा हैं. नारे लगाए जाते हैं कि भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला इंशा अल्लाह.

भारत में रहते हुए भारत से ही आज़ादी तो मांगी जा सकती है. भारत के टुकड़े टुकड़े करने के नारे भी लगाए जा सकते हैं. लेकिन जब यहां स्वामी विवेकानंद की मूर्ति लगाई जाती है तो इसका विरोध शुरू हो जाता है. इन्हें अफ़ज़ल गुरु से इन्हें कोई समस्या नहीं है, कसाब और बुरहान वानी जैसे आतंकवादी इन्हें भटके हुए युवा लगते हैं. लेकिन जब इनके ही देश का प्रधानमंत्री इन्हीं के देश की संस्कृति को दुनिया भर में फैलाने वाले एक महापुरुष की मूर्ति का अनावरण करता है तो ये लोग इसका विरोध करने लगते हैं.

हालांकि कल जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति का अनावरण कर रहे थे, तब JNU में भारत माता की जय के नारे भी गूंजे.

स्वामी विवेकानंद मानते थे कि शिक्षा के ज़रिए ही किसी व्यक्ति के अंदर छिपे असली गुणों को बाहर लाया जा सकता है. लेकिन आज शिक्षा के एक मंदिर पर ही टुकड़े टुकड़े गैंग ने अतिक्रमण कर लिया है और ये लोग देश के साथ साथ स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों के विचारों के भी टुकड़े टुक़ड़े कर देना चाहते हैं. कल प्रधानमंत्री मोदी ने कार्यक्रम के दौरान स्वामी विवेकानंद के विषय में जो बातें कहीं वो पूरे देश को सुननी चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि ये बातें सुनकर ही JNU के छात्रों को सही और गलत की पहचान हो जाए.

स्वामी विवेकानंद के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि
जिन स्वामी विवेकानंद की मूर्ति का JNU के छात्र विरोध कर रहे हैं. उनके जीवन को अगर इन छात्रों ने सही मायनों में समझा होता तो आज इन छात्रों की ज़ुबान पर उनका विरोध नहीं होता बल्कि उनकी एक मूरत इन छात्रों के दिल में बसी होती.

स्वामी विवेकानंद के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि उन्होंने दुनिया को भारत की शक्ति का अहसास करवाया.

आज से 600 वर्ष पहले अमीर खुसरो नामक फ़ारसी विद्वान ने भारत की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि ‘भारत की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि पूरी दुनिया के लोग शिक्षा के लिए भारत आते हैं. भारत का कोई व्यक्ति शिक्षा लेने के लिए कभी विदेश नहीं जाता’

वर्ष 1893 में अमेरिका के शिकागो में जब पहली विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ. तब स्वामी विवेकानंद ने एक ऐसा ओजस्वी भाषण दिया था जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था.

भाषण की शुरुआत में उन्होंने कहा था – “Sisters And Brothers Of America” यानी “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों” और आपको ये जानकर अच्छा लगेगा कि उनके इन शब्दों को सुनकर वहां मौजूद 7 हज़ार लोगों ने करीब 2 मिनट तक स्वामी विवेकानंद के लिए खड़े होकर तालियां बजाई थीं और उनका अभिवादन किया था.

 सबसे महान वक्ता थे
वर्ष 1893 में कई सदियों के बाद दुनिया ने भारत का वैश्विक रूप देखा था. इस ऐतिहासिक भाषण के बारे में आपने ज़रूर पढ़ा और सुना होगा. लेकिन इस भाषण के बाद पूरी दुनिया में किस तरह की प्रतिक्रिया हुई थी. तब अमेरिका के अखबारों में क्या छपा था ? ये आज आपको ज़रूर जानना चाहिए.

Rajagopal Chattopadhyaya की एक किताब ‘Swami Vivekananda in India: A Corrective Biography’ के पेज नंबर 150 पर अमेरिका के एक अख़बार The New York Critique की टिप्पणी का ज़िक्र है. इस अखबार ने स्वामी विवेकानंद के बारे में लिखा था कि ‘कई लोगों ने बहुत अच्छा भाषण दिया लेकिन एक हिंदू साधु ने विश्व धर्म संसद के विषय को जिस तरह लोगों के सामने रखा, वैसा कोई और नहीं कर सका. वो एक बहुत बड़े वक्ता हैं. अख़बार ने लिखा कि वो उनका पूरा भाषण छाप रहा है. लेकिन वहां मौजूद लोगों पर उनके भाषण का जो प्रभाव पड़ा, उसे बयान कर पाना बहुत मुश्किल है. उनका तेजस्वी चेहरा, उनकी बुद्धिमत्ता और उनकी वेशभूषा के प्रभाव को बताने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं ‘

एक और अखबार The New York Herald ने लिखा था कि ‘इसमें कोई शक नहीं है कि विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद सबसे महान वक्ता थे. उन्हें सुनने के बाद ये लगता है कि इतने विद्वान और बुद्धिमान देश में Missionaries को भेजना कितना मूर्खतापूर्ण है.’

Stefanie Syman नामक एक विद्वान ने अपनी किताब ‘The Subtle Body: The Story of Yoga in America’ में एक अख़बार ‘The Boston Evening Transcript’ की टिप्पणी का ज़िक्र किया है. स्वामी विवेकानंद के बारे में इस अख़बार ने लिखा था कि ‘Columbus Hall में बैठे हुए 4 हज़ार लोग सिर्फ़ इसलिए दो घंटों से दूसरों का भाषण सुन रहे थे क्योंकि उन्हें स्वामी विवेकानंद के 15 मिनट के भाषण का इंतज़ार था . ‘

देश के कुछ युवाओं ने इस शक्ति को भुला दिया है
ये स्वामी विवेकानंद की वो शक्ति थी जिसे पूरी दुनिया ने महसूस किया था. लेकिन आज हमारे ही देश के कुछ युवाओं ने इस शक्ति को भुला दिया है.

आज हमने स्वामी विवेकानंद के जीवन पर लिखी एक पुस्तक को पढ़ा जिसका नाम है The Monk As Man, इसके लेखक हैं मणिशंकर मुखर्जी. उन्होंने स्वामी विवेकानंद के बारे में महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं.

आज युवा पीढ़ी को innovation और नए Ideas की ज़रूरत है. बेरोज़गारी आज भी देश की प्रमुख समस्या है. देश की युवा पीढ़ी को विवेकानंद के कुछ विचारों से बहुत मदद मिल सकती है.

स्वामी विवेकानंद ने कहा था ”Take Risks In Your Life, If you win, You can Lead, If you loose, You can guide” मतलब “अपने जीवन में जोखिम उठाओ, अगर तुम जीतोगे तो नेतृत्व करोगे और अगर हारोगे तो लोगों का मार्गदर्शन करोगे.”

सांप्रदायिक तनाव और जातिगत भेदभाव आज भारत की एक बहुत बड़ी समस्या
सांप्रदायिक तनाव और जातिगत भेदभाव आज भारत की एक बहुत बड़ी समस्या है. अगर भारत का हर नागरिक, स्वामी विवेकानंद के इन विचारों से सीख ले तो ये समस्या भी ख़त्म हो सकती है. स्वामी विवेकानंद ने अपने बारे में कहा था कि “अगर मैं अपने अनगिनत दोषों के बावजूद खुद से प्यार करता हूं, तो मैं कुछ दोषों की वजह से किसी दूसरे से नफ़रत कैसे कर सकता हूं.”

भारत कभी विश्व गुरु हुआ करता था और आज ढोंगी बाबाओं की वजह से भारत बदनाम हो रहा है. भारत में आज एक आध्यात्मिक भ्रष्टाचार चल रहा है. इस समस्या का इलाज भी स्वामी विवेकानंद ने बहुत पहले ही बता दिया था.

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि कोई भी आपको आध्यात्मिक नहीं बना सकता. आपकी सबसे बड़ी शिक्षक आपकी अपनी अंतरआत्मा है,
ये स्वामी विवेकानंद के वो विचार हैं वो आज भी बहुत प्रासंगिक हैं.



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