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आईवीएफ तकनीक का लाभ लेने से पहले जरूर जान लें ये बातें

आईवीएफ तकनीक की मदद से आपको माता-पिता बनने का सुख मिल सकता है.

आईवीएफ तकनीक की मदद से आपको माता-पिता बनने का सुख मिल सकता है.

आईवीएफ तकनीक (IVF Technology) संतान सुख पाने में आपकी मदद कर सकती है. इस तकनीक (Technology) की प्रक्रिया तीन तरह की होती है- नेचुरल, मिनिमल और कनवेंशनल.



  • Last Updated:
    December 18, 2020, 11:34 AM IST

देश में कई ऐसे लोग हैं, जिनमें प्रजनन से संबंधित कई शारीरिक समस्याएं (Reproductive Physical Problems) होती हैं. ऐसे लोग आमतौर पर खराब जीवन शैली, तनाव, अनियमित डाइट, गलत आदतों के कारण प्रजनन संबंधित शारीरिक समस्याओं के शिकार होते हैं. ऐसे में आईवीएफ तकनीक (IVF Technology) आपकी मदद कर सकती है और आपको माता-पिता बनने का सुख मिल सकता है, लेकिन तकनीक का इस्तेमाल करते समय कुछ बातों की सावधानी रखना जरूरी है. अगर आप भी आईवीएफ तकनीक के जरिए माता-पिता बनना चाहते हैं तो इन बातों को जरूर जान लें-

  • myUpchar के अनुसार आईवीएफ तकनीक को अपनाने से पहले पूरी तरह से संतुष्ट हो जाना चाहिए कि प्रजनन की समस्या क्या है. गर्भ नहीं ठहर पाने के पीछे कई शारीरिक कारण हो सकते हैं जैसे हार्मोन से जुड़ी समस्या, ट्यूब में संक्रमण या शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थता आदि. ऐसे में उचित मेडिकल चेकअप करवा लेना चाहिए. इसके बाद ही आईवीएफ तकनीक को अपनाना चाहिए.
  • आईवीएफ तकनीक अपनाने से पहले मेल फर्टिलिटी टेस्ट भी करवा लेना चाहिए. मेल फर्टिलिटी टेस्ट से पुरुषों में शुक्राणु की जांच की जाती है. यदि पुरुष की जांच की रिपोर्ट ठीक आ जाए, उसके बाद ही आईवीएफ तकनीक अपनाना चाहिए.
  • आईवीएफ तकनीक को अपनाना तब सही होता है, जब महिला के ट्यूब में ब्लॉकेज हों. कुछ मामलों में पीसीओएस की स्थिति में भी आईवीएफ का विकल्प अपनाया जाता है. दरअसल पीसीओएस महिलाओं के शरीर में हार्मोन के असंतुलन और अंडा निषेचित नहीं होने की स्थिति कहलाती है. महिलाओं में पीसीओएस की शारीरिक समस्या को आईयूआई और आईवीएफ तकनीक से ठीक किया जा सकता है.

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  • myUpchar के अनुसार आईवीएफ तकनीक की प्रक्रिया तीन तरह की होती है- नेचुरल, मिनिमल और कनवेंशनल. नेचुरल आईवीएफ कुदरती रूप से बने अंडे के जरिए किया जाता है न कि स्टिमुलेशन के जरिए तैयार किए गए महिला के अंडाणु से. यह प्रक्रिया उन महिलाओं के लिए सही होती है, जो बहुत ज्यादा इलाज या दवा आदि के खर्च से बचना चाहती हैं. वहीं मिनिमल स्टिमुलेशन आईवीएफ में दवा के जरिए स्वस्थ अंडाणु तैयार किए जाते हैं. इस तकनीक में खर्च थोड़ा बढ़ जाता है. तीसरी तरह की आईवीएफ तकनीक पारंपरिक तरीके से की जाती है, जिसे कनवेंशनल आईवीएफ कहा जाता है, जिसमें अंडाणु और वीर्य को विशेष माहौल में मिलाया जाता है, जिसमें निषेचन की संभावना काफी ज्यादा होती है और प्रजनन की संभावना काफी बढ़ जाती है.

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  • जब महिला का अंडाणु तैयार हो जाता है तब इसमें स्पर्म इंजेक्ट किया जाता है. आईसीएसआई तकनीक के जरिए वीर्य के संपर्क में अंडाणु को लाया जाता है. इसी प्रक्रिया के जरिए भ्रूण तैयार होने लगता है. आईवीएफ तकनीक में भ्रूण की निगरानी की प्रक्रिया बेहद खास होती है. अंडा निकालने के 48 घंटे बाद कम से कम दो तीन सेल्स होने चाहिए. 72 घंटे या तीन दिन के बाद यह संख्या 7-10 होनी चाहिए. पांचवे दिन भ्रूण ब्लास्टोसिस्ट स्टेज में पहुंच जाता है. इसे टेस्ट ट्यूब सेंटर में पूरी तरह से निगरानी में किया जाता है. अगर भ्रूण हस्तांतरित करने के प्रक्रिया सही तरह से हो जाती है तो गर्भधारण में ज्यादा से ज्यादा 15 दिन का समय लगता है. 15 दिन के बाद प्रेग्नेंसी टेस्ट के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि आईवीएफ की प्रक्रिया सफल हुई है या नहीं.

अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल, टेस्ट ट्यूब बेबी क्या है पढ़ें।

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